उदारवादी (THE MODERATES)

 अपनी स्थापना के प्रारम्भिक 20 वर्षों (1885-1905) तक कांग्रेस की नीति अत्यन्त उदार रही। इसलिए इस युग को इतिहास में ‘उदारवादी राष्ट्रीयता का युग' या उदारवादी युग कहा जाता है। इस युग के दौरान कांग्रेस की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में थी जो ब्रिटिश सरकार से संघर्ष मोल लेना नहीं चाहते थे तथा वे सरकार के साथ सहयोग करके उससे प्रार्थना एवं अनुरोध करके ही अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते थे। वे अंग्रेजी सरकार के समर्थक एवं प्रशसक थे तथा ब्रिटिश शासन को भारतीयों के लिए वरदान मानते थे। पर ब्रिटिश विचारधारा, साहित्य एवं सभ्यता का उन पर बहुत अधिक प्रभाव था। वे इंग्लैण्ड की संस्थाओं के प्रशंसक थे तथा अंग्रेजों की न्यायप्रियता में पूर्ण विश्वास रखते थे। वे अंग्रेजी शासन के भक्त थे। उनका विश्वास था कि यदि वे प्रार्थना-पत्रों के माध्यम से अपनी माँगें सरकार के सामने रखेंगे तो सरकार उन्हें अवश्य ही स्वीकार कर लेगी। उन्होंने जनता की माँगों को प्रार्थना-पत्रों, स्मृति-पत्रों एवं प्रतिनिधि मण्डलों के द्वारा सरकार तक पहुँचाया तथा प्रशासन में सुधार संबंधी अनेक प्रस्ताव पास किए। उस समय तक जनता में राष्ट्रवादी चेतना का प्रसार काफी कम हुआ था अतः उदारवादी नेताओं ने सावधानीपूर्वक कदम उठाकर भारत में राष्ट्रीय चेतना की जड़ों को मजबूत किया तथा जन-जन को राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाया। उन्होंने अपने तरीकों द्वारा जनता के सामने सही  ढंग हे ब्रिटिश सरकार का शोषणकारी चरित्र प्रस्तुत किया। उदारवादी नेताओं में दादाभाई नौरोजी, महादेव गोविन्द रानाडे, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी मेहता, गोपालकृष्ण गोखले, मदन मोहन मालवीय, व्योमेशचन्द्र बेनजी, के० टी० तेलंग, डी० ई० वाचा, बदरुद्दीन तैयब जी मोहन बोस आदि का नाम मुख्य रूप से लिया जा सकता है। (A) उदारवादियों के सिद्धान्त principles of Moderates) जी० आर० प्रधान ने लिखा है कि, "कांग्रेस के संस्थापक आकाश में उड़ने वाले आदर्शवादी नहीं ये बल्कि वे व्यावहारिक सुधारक ये तया उदारवाद की भावनाओं एवं सिद्धान्तों से ओतप्रोत थे। वे स्वतंत्रता की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाना चाहते थे। इसलिए उनकी हीं बहुत ऊँथी नहीं थीं। उन्होंने सुधार के ऐसे प्रस्ताव को रखा जिनका कम-से-कम विरोध हो।" इस प्रकार प्रथम बीस वर्षों के देसी नेताओं ने बड़ी संयमता एवं नरमाई से अपनी माँगें सरकार के सामने रखीं। उनके सिद्धान्तों का विवरण इस प्रकार है- 1. ब्रिटिश शासन के प्रति भक्तिभाव (Loyalty to the British Crown)-उदारवादी नेता पश्चिमी सभ्यता एवं विचारों से पूर्ण रूप से प्रभावित थे तथा वे इसी सभ्यता की उपज थे। उनकी मान्यता थी कि ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा, यातायात एवं संचार है साधनों का जो विकास हुआ है उसी के परिणामस्वरूप भारत आधुनिक युग में प्रवेश कर सका है। यही कारण था कि वे अंग्रेजी शासन को भारत के लिए बरदान मानते थे। उनके मन में देशभक्ति के साथ-साथ राजभक्ति भी विद्यमान थी। यदि हम कांग्रेस के ब्रायों का अध्ययन करें और सदस्यों के भाषणों को पढ़ें तो हम देखेंगे की वे अपने भाषणों तथा प्रस्तावों में स्वामिभक्ति की चर्चा जाते रहते थे। प्रायः प्रत्येक अधिवेशन, महारानी विक्टोरिया की हुर्रे, तीन बार बोलकर समाप्त किया जाता था। कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन हे आयक्ष व्योमेशचन्द्र बनर्जी ने कहा था कि, "मैं सब उपस्थित सज्जनों के मत को व्यक्त कर रहा हूँ। मैं कहता हूँ कि अंग्रेजी सरकार को मेरे तथा यहाँ बैठे हुए मेरे मित्रों की अपेक्षा, अधिक गहरे तथा पक्के राजभक्त व्यक्ति मिलना असम्भव है।" इसी प्रकार कांग्रेस में दूसरे अधिवेशन के अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने भी अपने सहयोगियों की भावना को व्यक्त करते हुए कहा कि, "आओ हम पुरुषों से तरह बोलें और घोषणा कर दें कि हम पूर्ण रूप से राजभक्त हैं।" उदारवादियों की ब्रिटिश ताज के प्रति इतनी गहरी स्वामिभक्ति एवं बफादारी का अर्थ यह नहीं था वे देशभक्त नहीं थे। वे उच्च आदशों से प्रेरित थे। उन्होंने देशभक्ति तथा स्वामिभक्ति का उचित जानमेत स्थापित करके बड़े संयम के साथ कांग्रेस आन्दोलन को आगे बढ़ाया। 2. अंग्रेजों की न्यायप्रियता में विश्वास (Faith in sense of Justice of British)- उदारवादियों का अंग्रेजों की सत्यता एवं न्यायप्रियता में गहरा विश्वास था उनका विचार था कि लोकतंत्र समानता एवं स्वतंत्रता की परम्परा बाली अंग्रेज जाति भारत के प्रति एवं उदारता का व्यवहार करेगी भारतीय शासन की बुराइयों का कारण वे नौकरशाही व शासन-प्रणाली को मानते थे। वे यह ते थे कि यदि वे अपनी समस्याओं और कठिनाइयों की अंग्रेजों के सामने रखेंगे तो निश्चय ही उनके प्रति न्याय किया जाएगा। to पट्टामिसीतारमैया ने लिखा है कि उदारवादियों का मानना था कि यदि अंग्रेजों को भारतीय दृष्टिकोण का सही ज्ञान करवा दिया तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे। गोपालकृष्ण गोखले ने कहा था कि, "अंग्रेज जाति की न्यायप्रियता तथा उदारता में हमारी अबोध ना है।" सर फिरोजशाह मेहता की भी मान्यता थी कि अंग्रेज हमारी पुकार अवश्य सुनेंगे। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कहना था कि "अंग्रेजों के न्याय, बुद्धि तथा दया की भावना में हमारा दृढ विश्वास है। संसार की महानतम प्रतिनिधि संस्था, संसदों की जननी, ब्रिटिश कामन्स सभा के प्रति हमारे हृदय में श्रद्धा है। अंग्रेजों ने सर्वत्र प्रतिनिष्यात्मक आदर्श पर की शासन की रचना की है।" कांग्रेस के 12वें अधिवेशन के अध्यक्ष पद से बोलते हुए रहीमतुल्ला सयानी ने कहा था कि, "अंग्रेजों से बढ़कर सच्चरित्र तथा सच्ची जाति इस सूर्य के प्रकाश के नीचे नहीं बसती । "2 दादाभाई नोराजी भी कहा करते थे, “में आशा करता हूँ कि वह दिन दूर नहीं जब अंग्रेज स्वेच्छा से भारत से चले जाएँगे। इंग्लैण्ड के लोगों को वस्तु स्थिति से परिचित करवाने के लिए काँग्रेस ने दादाभाई नौरोजी को इंग्लैण्ड में रहकर भारत संबंधी कार्य करने के लिए प्रेरित किया था। उन्होंने 'इण्डिया' नामक समाचार-पत्र निकालकर तथा वहाँ की पार्लियामेंट की सदस्यता प्राप्त करके इंग्लैण्ड की जनता की सहानुभूति पाने का भी प्रयास किया था। 3. क्रमिक सुधारों में विश्वास (Faith in Gradual Reforms)- उदारवादी नेता क्रांतिकारी परिवर्तनों के विरोधी थे तथा भूमिक सुधारों में विश्वास करते थे। वे राजनीतिक तथा प्रशासनिक क्षेत्र में धीरे-धीरे सुधार लाना चाहते थे। उनका मुख्य उद्देश्य प्रशासन में आवश्यक सुधारों, विधायी परिषदों, सेवाओं, स्वायत्त संस्थाओं तथा रक्षा सेवाओं में ही सुधार करवाना था। वे क्रमशः सुधार लाकर या प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाकर उन्हें स्वशासन के लिए प्रेरित करना चाहते थे। रास बिहारी घोष का कहना था कि, 

We have abounding faith in the justice and generosity of the English people.-G.K. Gokhale 

"A more honest of sturdy nation does not exist under the sun than this English nation. Rahim Tulla Sayani 


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