Imperialism (साम्राज्यवाद)
Q1:- साम्राज्यवाद के अर्थ से आप क्या समझते हो। साम्राज्यवाद के प्रमुख कारणों का वर्णन करो। (What is mean by Imperialism ? Main causes of Imperialism. Describe.)
19वीं शताब्दी के यूरोप के अधिकतर देश एशिया तथा अफ्रीका के देशों का आर्थिक शोषण करने लगे तथा शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस शोषण की दौड़ तेज हो गई व दूसरी तरफ इन देशों के बीच अपने स्वार्थी की होड़ भी आरंभ हो गई। परिणामस्वरूप ये देश एशिया तथा अफ्रीका के भू-भागों पर अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयास करने लगे। यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा आधिपत्य स्थापना की यह कोशिश 'साम्राज्यवाद' कहलायी । साम्राज्यवाद का अर्थ (Meaning of Imperialism) एक राजनीतिक अवधारणा, व्यवस्था तथा आचरण के रूप में साम्राज्यवाद उतना ही प्राचीन है जितना राज्य परंतु साम्राज्यवाद का अर्थ व स्वरूप भिन्न-भिन्न युगों में कई आधारों पर बदलता रहता है। साधारण अर्थ में साम्राज्यवाद का अभिप्राय एक विशाल आकार की राज्य व्यवस्था से लिया जाता है जिसके अंतर्गत अनेक राष्ट्र तथा देश एक केंद्रीकृत राजनीतिक सत्ता की अधीनता में रहते हैं और साम्राज्य के अधिपति को सम्राट की संज्ञा दी जाती है। यह धारणा प्राचीनकाल में विद्यमान साम्राज्यों का आभास करवाती है। परंतु वर्तमानकालीन साम्राज्यवाद इससे अलग है जिसका स्वरूप राजनैतिक की अपेक्षा आर्थिक अधिक है। साम्राज्यवाद को अंग्रेजी भाषा में Imperialism कहा जाता है जो Imperator से लिया गया है जिसका शाब्दिक अर्थ सम्राट अथवा बड़े राज्य का स्वामी है। विभिन्न विद्वानों ने समय-समय पर 'साम्राज्यवाद' शब्द की व्याख्या अपने-अपने ढंग से की है। जो इस प्रकार है- "साम्राज्यवाद वह नीति है जिसका उद्देश्य एक साम्राज्य का सृजन, संगठन तथा अनुक्षरण करना है। इसका अभिप्राय ऐसे विशाल आकार के राज्य से है जो न्यूनाधिक मात्रा में अनेक पृथक् राष्ट्रीय इकाइयों से निर्मित हो और जो एक एकाकी केंद्रीकृत इच्छा की अधीनता में हो।"-समाज विज्ञानकोश "साम्राज्यवाद अधीस्थ प्रजाजनों के ऊपर शक्ति तथा हिंसा द्वारा लादा गया विदेशी शासन है भले ही इसके विरुद्ध कितने ही नैतिक तर्क तथा बहाने प्रस्तुत किए जाए।"- प्रो. शूमैन "विभिन्न देशों तथा प्रवासियों के ऊपर एक ही प्रकार के कानून तथा शासन की पद्धति लागू करने की व्यवस्था को साम्राज्यवाद कहा जाता है।" सी. डी. बर्स "साम्राज्यवाद का अर्थ गैर यूरोपीय जातियों पर उनसे सर्वथा भिन्न यूरोपीय राष्ट्रों के शासन से है।"
"सभ्य राष्ट्रों की कमजोर एवं पिछड़े देशों पर शासन करने की इच्छा व नीति साम्राज्यवाद कहलाती है।"-पार्ल्स. ए. बेयर्ड "साम्राज्यवाद में दूसरे देशों के जीतने का प्रयास निहित रहता है।"-एन.एल. बुखारिन “साम्राज्यवाद का भावार्य एक राज्य, राष्ट्र, अथवा लोगों के ऐसे अन्य समूह पर शासन अथवा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अधिकार राजनीतिक, आर्थिक अधिकार स्थापित करने की तीव्र इच्छा है।"- लेंगर उ
परोक्त परिभाषाएं अतीतकालीन साम्राज्यवादी व्यवस्थाओं का आभास करवाती है जो प्रादेशिक विस्तारवादी प्रभुत्व से युक्त थी। इनके अंतर्गत वर्तमान समय के शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा कमजोर राष्ट्रों के ऊपर प्रयुक्त आर्थिक तथा कूटनीतिक प्रभाव एवं प्रभुत्व की स्थिति नहीं दर्शायी गयी है। वस्तुतः आधुनिक साम्राज्यवाद निर्बल प्रजापतियों के आर्थिक शोषण, राजनीतिक आधिपत्य तथा व्यापक भौतिकवाद की नीति है। वर्तमान सदी के दो विश्व युद्धों के परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीयवाद की धारणा के विकास के कारण राष्ट्रवादी चेतना का व्यापक प्रसार हुआ है। अतः प्रादेशिक साम्राज्यवादी चेतना पतन होता गया है। साम्राज्यवादी देशो की आर्थिक शक्तियों (पूंजीपति, उद्योगपति, व्यवसायी) ऐसे साम्राज्य विस्तार में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इस प्रकार हम प्राचीन एवं आधुनिक (नवीन) साम्राज्यवाद को अलग-अलग ढंग से देख सकते हैं। अध्ययन की सुविधा के लिए साम्राज्यवाद के विभिन्न रूपों का विवरण देना अनिवार्य है जो इस प्रकार है-
1. प्राचीन साम्राज्यवाद (Old Imperialism) : यह साम्राज्यवाद की वह व्यवस्था थी जब कोई शक्तिशाली शासक अपनी महत्त्वाकांक्षी विजय अभिलाषा से दूसरे देश या राज्य (राजा) को पराजित करके उस प्रदेश को अपने साम्राज्य का भाग बना लेता था तथा वहां अपनी शासन व्यवस्था स्थापित करता था। प्राचीन मौर्य साम्राज्य रोमन साम्राज्य तथा मंगोलों के साम्राज्य इसके उदाहरण है। 15वीं शताब्दी तक इस प्रकार की व्यवस्था चलती रही।
2. उपनिवेशवाद (Colonism) पुनर्जागरण के दौरान होने वाली भौगोलिक खोजों से यूरोप के राष्ट्रों ने अज्ञात क्षेत्रों पर अधिकार करके जो साम्राज्य स्थापित किया, उसे 'ओपनिवेशिक साम्राज्यवाद' या उपनिवेशवाद कहा जाता है। इसे 'आर्थिक साम्राज्यवाद' भी कहा जाता हैं साम्राज्यवाद का यह रूप 16-19वीं सदी तक प्रचलित रहा।
3. नव साम्राज्यवाद (New Imperialism) जब कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आर्थिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार कर लेता है, उसे 'नव साम्राज्यवाद' कहा जाता है। दूसरे विश्व-युद्ध के बाद साम्राज्यवाद का एक नया रूप सामने आया जिसमें विभिन्न राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करते हैं अथवा प्रभावित करने के लिए दबाव डालते हैं, जिसे 'नव उपनिवेशवाद' के नाम से जाना जाता है।
साम्राज्यवाद के प्रसार के कारण (Causes of Expension of Imperialism)
साम्राज्यवाद एक ऐसी विचारधारा थी जिसमें समय-समय पर अनेक परिवर्तन आते रहे परंतु फिर भी इसके उदय के कारण लगभग एक ही स्वरूप वाले थे, जिनका वर्णन इस प्रकार है-
1. आर्थिक कारण (Economic Reasons / Causes) नवीन साम्राज्यवाद के विकास में सबसे अधिक योगदान आर्थिक पक्ष का था। इस विचारधारा में राजनीतिक सीमाओं को बढ़ाने पर इतना अधिक बल नहीं दिया जाता था जितना आर्थिक संसाधनों पर शोषण पर। डेविड वामसन ने लिखा है कि, "यह सत्य है कि प्रत्येक देश द्वारा अन्य स्थानों में धन निवेश, जोकि सुरक्षित तथा जिसका परिणाम आकर्षक था, की नीति ने 19वीं शताब्दी के अंत में अधिक से अधिक उपनिवेशों की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया।" साम्राज्यवाद के उदय में सहायक आर्थिक कारणों का वर्णन निम्न प्रकार से है-
(i) अतिरिक्त उत्पादन (Surplus Production) : 1870 ई. के पश्चात् यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि हुई। इन देशों में उत्पादन बढ़ने के कारण अब इनको यह चिंता सताने लगी कि इसके अतिरिक्त उत्पादन को बेचा कहां जाए तथा नए उत्पादन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति कहां से की जाए। इन सब जरूरतों को उपनिवेशों में बाजार तथा कच्चा माल दोनों की भरमार थी। इससे नवीन साम्राज्यवाद को बल मिला।
(ii) अतिरिक्त पूंजी (Surplus Capital) : औद्योगिक क्रांति के कारण उत्पादन बढ़ा, लागत कम हुई, कम समय में ज्यादा उत्पादन हुआ जिसके परिणामस्वरूप पूंजीपतियों के लाभ में वृद्धि हुई। इस प्रकार यूरोप के पूंजीपतियों के पास काफी धन अतिरिक्त पूंजी के रूप में एकत्रित होने लगा। पूंजीपतियों ने अपनी इस अतिरिक्त पूंजी को ऐसे स्थानों या देशों या उपनिवेशों में लगाने को प्राथमिकता दी जहां पर उत्पादन लागत कम हो, लाभ अधिक हो और प्रतियोगिता का भय न हो। उपनिवेशों के अतिरिक्त इसका और बेहतर विकल्प नहीं हो सकता था। इसलिए अतिरिक्त पूंजी भी साम्राज्यवाद के उदय में सहायक बनी।
(iii) कच्चे माल की आवश्यकता (Requirement of Raw Material): औद्योगिक क्रांति के कारण जब बड़े पैमाने पर माल का उत्पादन होने लगा तो माल तैयार करने के लिए अधिक कच्चे माल की आवश्यकता ने भी उपनिवेशों की स्थापना को बढ़ावा दिया। अतः कच्चा माल प्राप्त करने के लिए यूरोपीय देश अविकसित देशों पर अधिकार जमाने का प्रयास करने लगे। यह प्रयास भी साम्राज्यवाद के उदय में एक सहायक कारण बनी।
(iv) बढ़ती जनसंख्या का दबाव (Pressure of Increasing Population) : यूरोपीय साम्राज्यवाद का एक कारण यह भी था कि वहां के छोटे आकार के देशों में बढ़ती जा रही जनसंख्या को बसाने की समस्या आ गयी थी। अतः दुनिया के ऐसे महाद्वीपों में जहां विशाल भूखंड जनसंख्याहीन थे, इन यूरोपीय राष्ट्रों के आकर्षण के केंद्र बने। वहां इन देशों की अतिरिक्त जनसंख्या बसने लगी। धीरे-धीरे इन यूरोपीय देशों ने वहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।
(v) यातायात व संचार के साधनों का विकास (Development of meant of Transport and Communication) : औद्योगिक क्रांति के कारण सड़कों, रेलवे एवं अन्य साधनों का विकास हुआ। इस • प्रकार तार व बेतार जैसे संचार साधनों ने विश्व को समेट कर रख दिया। जहाजरानी के विकास ने उपनिवेशों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यूरोप के पूंजीपतियों ने रेलवे एवं यातायात के अन्य साधन विकसित करने के लिए अविकसित देशों में बड़ी भारी पूंजी भी लगाई जिसकी सुरक्षा के लिए इन देशों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना अति आवश्यक था। इस प्रकार यातायात एवं संचार के साधनों के विकास ने भी साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया।
2. राजनीतिक कारण (Political Causes) साम्राज्यवाद के उदय और विकास में राजनीतिक पृष्ठभूमि ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। डेविड यामसन के अनुसार, “आर्थिक कारणों के समान ही राजनीतिक कारण भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थे।” सैनिक अधिकारियों, राजनीतिज्ञ, विचारकों, धर्माधिकारियों ने भी अपने-अपने स्वार्थों से प्रेरित होकर साम्राज्यवाद का समर्थन किया तथा अपनी-अपनी सरकारों पर साम्राज्यवाद के प्रसार के लिए लगातार दबाव डाला। ऐसे प्रयासों के कारण साम्राज्यवाद को बढ़ावा मिला। प्रमुख राजनीतिक कारणों का वर्णन निम्न प्रकार से है-
(i) राष्ट्रीयता की भावना (Spirit of Nationalism) अनेक राष्ट्रों के साम्राज्यवादी बन जाने का एक कारण उनमें पनप रही उग्र राष्ट्रवाद की धारणा का होना भी था। वे इस बात के आकांक्षी बने रहे कि अपने राष्ट्र की सभ्यता तथा संस्कृति को पिछड़े तथा निर्बल राष्ट्रों के लोगों पर थोपा जाए और उन्हें ऐसा विश्वास दिलाया जाए कि साम्राज्यवादी देश की सभ्यता श्रेष्ठतर है। इटली, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, वेल्जियम, पुर्तगाल आदि राज्यों में इसी प्रकार के राष्ट्रवादी व्यक्तियों के प्रभाव के कारण उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन मिला। फ्लैट एवं ड्रमण्ड ने लिखा है कि, संसार के मानचित्र को अपने देश के उपनिवेशों में रंगा देखकर सामान्य नागरिक, तक प्रायः राष्ट्रीय गौरव से खिल उठता है।
(ii) व्यापारिक वर्ग का योगदान (Role of Traders) : व्यापारिक वर्ग ने अपने व्यवसाय की उन्नति के लिए साम्राज्यवादी विचारधारा का समर्थन किया। इस काम में बैंकों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। इस वर्ग के लोगों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी सरकार पर साम्राज्यवाद का मार्ग अपनाने के लिए दबाव डाला। जब इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डिजरैनी ने स्वेज नहर शेयर खरीदने का निश्चय किया तो बैंकों ने सरकार को तत्काल धन दे दिया तथा सरकार पर मिस्र पर अधिकार स्थापित करने के लिए दबाव डालते रहे। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस वर्ग का योगदान साम्राज्यवाद के उदय व विकास में कम महत्त्वपूर्ण न था ।
(iii) सैनिक वर्ग की भूमिका (Role of Military Officers) : सेना के अनेक अधिकारियों ने भी साम्राज्यवादों का समर्थन किया क्योंकि औपनिवेशिक स्पर्द्धा के कारण युद्धों की संभावना बनी रहती है। युद्धों में सैनिकों की भूमिका निर्णायक होती थी। नए जीते गए प्रदेशों को कई वर्षों तक सेना के नियंत्रण में रखा जाता है तथा इस अवधि में सैनिक अधिकारी प्रशासकों की भूमिका अदा करते हैं तथा लूट-खसोट से धन प्राप्त करते हैं। सैनिकों की इस भावना ने भी साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया।
(iv) सामरिक महत्त्व के स्थानों पर अधिकार (Occupation of Areas of Military Impor tance) : व्यापारिक सुरक्षा की दृष्टि से प्रमुख जलमार्गों के निकट स्थित द्वीपों तथा महाद्वीपों के तटवर्तीय क्षेत्रों पर अधिकार जमाना आवश्यक हो गया था। इंग्लैंड की मिस्र पर विजय भूमध्यसागर पर नियंत्रण रखने के लिए की गई थी फ्रांस ने मोरक्को पर भी इसी उद्देश्य के तहत अधिकार किया था अमेरिका ने प्रशांत 1 सागर में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए फिलिपाइन द्वीप पर अधिकार किया। यूरोप के देश महासागरों में स्थित द्वीपों पर अधिकार करके उन्हें अपने नौ-सैनिक अड्डों के रूप में प्रयोग करना चाहते थे।
इस प्रकार नव साम्राज्यवाद सिर्फ राजनीतिक नियंत्रण व औपनिवेशिक नीतियां ही नहीं है अपितु कुछ और भी है। औपनिवेशिक हित व नीतियां, औपनिवेशिक राज्य व प्रशासकीय संस्थाएं, औपनिवेशिक संस्कृति व समाज, औपनिवेशिक विचार व विचारधाराएं, ये सभी औपनिवेशिक ढांचे के भीतर ही कार्य करते हैं।
Q2:- 19वीं शताब्दी में साम्राज्यवाद के विकास कर अनुरेखण कीजिए। (Trace the development of Imperialism in 19th Century.)
एशिया तथा अफ्रीका के विभिन्न भूभागों को जिस प्रकार यूरोप के देशों ने अपने नियंत्रण में लिया उसे साम्राज्यवाद का विस्तार कहा जाता है। 19वीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों (1880-1900 ई.) में तो यूरोपीय देशों के बीच इतनी तीव्र होड़ लग गई कि उन्होंने एशिया व अफ्रीका के अधिकांश भागों को अपने नियंत्रण में ले लिया। इसके लिए सभी नैतिक व अनैतिक साधनों को माध्यम बनाया गया। यूरोपीय साम्राज्यवादी विस्तार का अध्ययन निम्न प्रकार से किया जा सकता है-
अफ्रीका का विभाजन (Partition of Africa) अफ्रीका क्षेत्रफल की दृष्टि से यूरोप से तीन गुणा बड़ा है। 19वीं शताब्दी से पहले इस महाद्वीपों का ज्ञान न होने के कारण इसे 'अंघ महाद्वीप' के नाम से जाना जाता था। अफ्रीका की अत्यंत कठोर जलवायु, रेगिस्तान तथा खराब समुद्र तटों का होना अफ्रीका में यूरोपवासियों द्वारा रुचि न लेने के प्रमुख कारण थे। परंतु 19वीं शताब्दी में दास व्यापार के महत्त्व ने अफ्रीका के महत्त्व बढ़ा दिया इसलिए यूरोप वालों ने अफ्रीका में रुचि लेना आरंभ किया। अफ्रीका की खोज (Discovery of Africa): 1843 ई. से 1890 ई. के मध्य यूरोप के अनेक साहसी खोजकर्ताओं ने संपूर्ण अफ्रीका की यात्राएं की तथा नये-नये प्रदेशों को खोज निकाला। ईसाई मिशनरियों ने भी अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों की खोज में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। अफ्रीका की खोज से संबंधित कुछ तथ्य इस प्रकार है-
(i) बार्थ, नाक्टिगल तथा बोगल आदि खोजकर्ताओं ने सहारा व सूडान के क्षेत्रों को ढूंढ निकाला।
(ii) ग्रांट, स्पेक तथा बेकर बड़ी झीलों के क्षेत्र खोजने में सफल रहे।
(iii) लिविंगस्टोन ने जाम्बेसी नदी के द्वारा यात्रा करके विक्टोरिया तथा न्याजा झीलों का पता लगाया तथा जाम्बेंसी की घाटी की खोज की लिविंगस्टोन की ढूंढने के लिए जब स्टेनली को भेजा गया तो उसने 1 कांगो की घाटी का पता लगाया। स्टेनली ने अपनी खोज के विषय में न द डार्क कानटीनेट (Thought the Continent) नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसने अफ्रीका को समूचे यूरोप में चर्चा का विषय बना दिया। इस प्रकार अफ्रीका एक 'अंब महाद्वीप' नहीं रहा। अतः यूरोप के देशों के बीच अफ्रीका पर अधिकार करने की होड़ शुरू हो गई। 1884-85 से 1914 ई. तक यूरोप की शक्तियों ने अफ्रीका को आपस में बांट लिया। इस प्रकार अफ्रीका यूरोपीय साम्राज्यवाद का शिकार हो गया। फ्रांस को यूरोपीय देशों ने आपस में मिलकर बांट लिया जिसका वर्णन इस प्रकार है-
1. बेल्जियम के उपनिवेश (Colonies of Balgium) अफ्रीका में उपनिवेशों की शुरुआत बेल्जियम के शासक द्वारा की गई थी। इस देश के शासक लियोपोल्ड के नेतृत्व में अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय सभा का आयोजन किया। स्टेनली 1879 से 1882 ई. तक कांगो प्रदेश में रहा तथा उसी के प्रयासों से अफ्रीका का एक विशाल भू-भाग लियोपोल्ड के संरक्षण में आ गया। लियोपोल्ड ने कांगो के विशाल राज्य की स्थापना की जो उसकी मृत्यु तक कायम रहा। इस प्रकार बेल्जियम द्वारा अफ्रीका के विभाजन की शुरुआत की गई।
2. फ्रांस के उपनिवेश (Colonies of France) : अफ्रीका के विभाजन का लाभ उठाने वालों ने फ्रांस भी एक महत्त्वपूर्ण यूरोपीय देश था फ्रांस, ट्यूनिस, मोरक्को व अल्जीरिया पर अधिकार करना चाहता था। परंतु मिस्र के आधिपत्य को लेकर इंग्लैंड व फ्रांस के स्वार्य आपस में टकराते थे अतः फ्रांस को अपना ध्यान मिस्र की तरफ से हटाकर अफ्रीका के अन्य भागों की तरफ ध्यान लगाना पड़ा जिनका वर्णन इस प्रकार है-
(i) अल्जीरिया पर फ्रांस 1830 ई. से ही अधिकार करना चाहता था परंतु वह प्रत्यक्ष कार्यवाही करने से हिचकता रहा परंतु 1880 में उसने इस पर अधिकार कर ही लिया।
(ii) यूनिश जिसे अफ्रीका का प्रदेश द्वार भी माना जाता है। फ्रांस के साथ-साथ सभी यूरोपीय देशों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण था। फ्रांस ने इटली के विरोध को दरकिनार करते हुए 12 मार्च, 1881 इको ट्यूनिश पर अधिकार कर लिया
(iii) अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित सेनेगल, आइवरी कोस्ट, गिनी आदि क्षेत्रों पर फ्रांस का अधिकार होने से अफ्रीका में फ्रांस की स्थिति काफी मजबूत हो गई।
(iv) फ्रांस ने 1869 ई. में अफ्रीका के पूर्वी तट पर स्थित सीमाली लैंड पर अपना अधिकार कर लिया।
(v) फ्रांस ने हिन्द महासागर में स्थित मैडागास्टर पर स्थानीय कबीले 'होवा' की शासिका के दोषपूर्ण शासन का लाभ उठाकर मैडागास्कर पर भी अधिकार कर लिया।
(vi) फ्रांस को मोरक्को पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। अंततः 1912 ई. में जर्मनी तथा फ्रांस के मध्य हुए समझौते के अनुसार मोरक्को पर फ्रांस का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।
3. इटली के उपनिवेश (Colonies of Italy) = 1870 ई. में इटली का एकीकरण होने के बाद वह भी शक्तिशाली साम्राज्यवादी देश बनकर उभरा। इटली ने उपनिवेशों के विस्तार करने के लिए जर्मनी व आस्ट्रिया के साथ मिलकर ‘त्रिराष्ट्रीय सोंचे' का निर्माण किया। इसके बाद इटली ने अपना ध्यान पूरी तरह से उपनिवेशों की स्थापना पर लगा दिया, जिससे इस प्रकार समझा जा सकता है-
(i) 1882 ई. में इटली ने लाल सागर में स्थित एरीद्रीया पर अधिकार कर लिया।
(ii) एरीट्रीया पर अधिकार करने के बाद इटली ने 1889 ई. में हिन्द महासागर में स्थित सोमालीलँड पर अधिकार कर लिया।
(iii) एडोवा के युद्ध में एबेसीनिया के शासक मेनलेक ने इटली को बुरी तरह हराया। अफ्रीका में साम्राज्य विस्तार के दौरान किसी यूरोपीय देशों की यह एकमात्र पराजय थी जिसके बाद इटली के कुछ समय के साम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया को रोक लिया।
(iv) इटली ने फ्रांस व रूस के साथ संधियां करके 1911 ई. में अदागीर संकट के समय ट्रीपोली तथा साइरेनका पर अधिकार कर लिया। अफ्रीका में इटली की यह उपलब्धि छोटी न थी क्योंकि ट्रीपोली उसके आकार से पांच गुणा बड़ा था।
4. जर्मनी के उपनिवेश (Colonies of Germany): जर्मनी ने अपने एकीकरण के बाद साम्राज्यवाद की तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया था क्योंकि उस समय उसका सारा ध्यान अपने घरेलू विकास पर लगा हुआ था। परंतु कुछ समय पश्चात् जब जर्मनी में औद्योगिकीकरण हुआ तो जर्मन व्यापारियों तथा उद्योगपतियों ने बिस्मार्क पर उपनिवेश स्थापित करने का दबाव डाला अतः बिस्मार्क भी इस दिशा में अग्रसर हुआ, जिसे निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
(i) 1883 ई. में जर्मनी के एक व्यापारी ल्यूडजि को दक्षिण पश्चिमी अफ्रीका एग्रापेक्वना के कुछ क्षेत्र प्राप्त किए। इन क्षेत्रों को जर्मन दक्षिण अफ्रीका कहा जाने लगा।
(ii) बिस्मार्क ने 1884 ई. में एक खोजकर्ता डॉ. नाखटिगोल को अफ्रीका के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में जर्मनी का प्रभाव स्थापित करने के लिए भेजा। उसके प्रयासों से टोगोलैंड तथा कैमरून पर जर्मनी का अधिकार हो गया।
(iii) 1884 ई. में जर्मनी के एक अन्य खोजकर्ता कार्ल पीटर्स ने अफ्रीका के पूर्वी तटीय प्रदेश में 60,000/- वर्ग मील क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया। इसमें जंजीवार तथा आसपास का क्षेत्र शामिल था।
(iv) पूर्वी अफ्रीका में जर्मनी का साम्राज्य विस्तार करने के लिए जर्मन ईस्ट आफ्रीका कंपनी की स्थापना की गई।
5. अफ्रीका की साम्राज्यवादी बंदरबांट में पुर्तगाल भी पीछे नहीं रहा। अफ्रीका में उसके उपनिवेश विस्तार का वर्णन इस प्रकार है-
(i) अफ्रीका के पश्चिमी तट के दक्षिणी भाग में स्थित अंगोला पर अपना अधिकार कर लिया।
(ii) पूर्तगाल ने पूर्वी अफ्रीका में मोजाम्बिक को भी अपना उपनिवेश बना लिया।
(iii) अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित गिनी पर भी पुर्तगाल ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
6. इंग्लैंड के उपनिवेश (Colonies of England) साम्राज्य के विस्तार के दौर में इंग्लैंड सबसे आगे रहा तथा उसके पास उपनिवेशों की संख्या सबसे ज्यादा थी। लेंगर ने लिखा है कि, “अफ्रीका के विभाजन में सर्वाधिक उपनिवेश इंग्लैंड ने ही स्थापित किए।" केप कालोनी नामक प्रदेश की प्राप्ति के पश्चात् अफ्रीका में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव पड़ी तथा कालान्तर में ब्रिटेन ने काहिरा से लेकर अन्तरीप तक के संपूर्ण भाग पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। इस प्रकार इंग्लैंड के पास अफ्रीका महाद्वीप का 1/3 भाग था जिनका वर्णन इस प्रकार है-
(i) मिस्र (Egypt) ब्रिटिश साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से मिस्र का अत्यधिक महत्त्व था। फ्रांस व इंग्लैंड के हित मिस्र में टकराते थे। मिस्र के शासक इस्माइल पाशा के बगावती तेवरों को देखते हुए इंग्लैंड व फ्रांस ने मिलकर उसको गद्दी से हटा दिया तथा तौफीक को मिस्र का शासक नियुक्त कर दिया जो इंग्लैंड व फ्रांस की कठपुतली थी। विदेशियों के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण मिस्र में राष्ट्रवादी शक्तियां फिर सिर उठाने लगी तथा इन शक्तियों ने 1881 ई. में अहमद अरबी पाशा के नेतृत्व में इंग्लैंड व फ्रांस के विरुद्ध आंदोलन कर दिया। तेल-अल-कबीर के युद्ध में इंग्लैंड ने अहमद अरबी को पराजित करके काहिरा पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार मिस्र इंग्लैंड के नियंत्रण में आ गया।
(ii) सूडान ( Sudan) : इंग्लैंड ने मिस्र पर अधिकार करने के बाद अपना सारा ध्यान सूडान पर लगा दिया। सूडान के राष्ट्रवादियों ने 1885 ई. में मोहम्मद अहमद मसीहा (मेंहदी देवदूत) के नेतृत्व में साम्राज्यवादियों के विरुद्ध आंदोलन तेज कर दिया तथा फरवरी 1885 ई. में मेंहदी ने मिस्र की सेना के जनरल गोर्डन की हत्या करके अपना अधिकार कर लिया। मेंहदी की मृत्यु के बाद उसके दुर्बल उत्तराधिकारियों के काल में सूडान में अव्यवस्था फैल गई। इसका लाभ उठाते हुए इंग्लैंड की सेनाओं में ‘किचनर' के नेतृत्व में 1898 ई. में 'ओडरमन के युद्ध' में राष्ट्रवादियों को पराजित करके अपना अधिकार स्थापित कर लिया। मिस्र पर अधिकार का महत्त्व था, अतः सूडान पर अधिकार करना इंग्लैंड की एक बड़ी उपलब्धि थी।
(iii) इंग्लैंड की 'इम्पीरियल ब्रिटिश ईस्ट अफ्रीका' कंपनी ने 1888 ई. में युगांडा तथा सोमालीलैंड के कुछ भाग पर अपना अधिकार कर लिया।
(iv) 1890 ई में इंग्लैंड ने जर्मनी के साथ एक समझौता किया जिसके अनुसार उसने हैलीगोलैंड के बदले में जर्मनी से 'जंजीवार' का उपनिवेश प्राप्त कर लिया।
(v) इंग्लैंड की चार्टड कंपनी ने गोल्ड कोस्ट, सायरा लियोन, गेम्बिया तथा नाइजीरिया आदि प्रदेशों को इंग्लैंड के लिए उपनिवेश बनाया।
(vi) इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका में 1815 ई. में अपना पहला उपनिवेश केप कालोनी स्थापित किया।
(vii) 1849 ई. में अंग्रेजों ने नटाल पर अधिकार कर लिया तो इसके लगते क्षेत्र पर नियंत्रण करना आसान हो गया।
(viii) अंग्रेजों को जब इस बात का पता चला कि ट्रांसवाल में सोने व हीरे की खानें हैं तो अंग्रेजों ने ट्रांसवाल पर अधिकार करने का निश्चय किया। 1902 की संधि के अनुसार बोअरो (ट्रांसवाल के निवासी) को अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी व ट्रांसवाल व औरंज फ्री स्टेट अंग्रेजी साम्राज्य का अंग बन गए।
(ix) इंग्लैंड के एक साहसी खोजकर्ता ने सेसिल रोडस 1870 ई. में दक्षिण अफ्रीका आया था। इस क्षेत्र का नाम 'रोडस' के नाम पर 'रोडेशिया' रखा गया। इस प्रकार अफ्रीका के बंटवारे में इंग्लैंड को अत्यधिक लाभ हुआ। कैटलबी ने लिखा है कि, "ब्रिटेन के कतिपय साम्राज्यवादी राजनीतिज्ञों के सपने साकार हो गए।" अफ्रीका का विभाजन यूरोप के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। यूरोप की साम्राज्यवादी शक्तियों ने बिना किसी युद्ध के लगभग संपूर्ण अफ्रीका महाद्वीप को आपस में बांट लिया। इस विभाजन का एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि, "युद्ध द्वारा अफ्रीका पर अधिकार कर लिए जाने के कारण वहां के जनजातीय युद्ध, प्लेग, अमानवीय यातनाएं आदि समाप्त हो गए तथा आवागमन के साधनों व शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार हुआ।" एशिया में साम्राज्यवाद का विस्तार (Expansion of Imperialism in Asia) एशिया में अफ्रीका से बहुत पहले साम्राज्यवादी प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। यूरोपीय साम्राज्यवाद की चपेट में अधिकतर एशिया के देश आ चुके थे। जापान और थाइलैंड ही ऐसे देश थे जो उनकी गिरफ्त से बाहर थे। इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल, हालैंड, रूस तथा जापान ने 19वीं शताब्दी के अंत तक अपने-अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए थे। एशिया में साम्राज्यवादी गति विधियों को विवरण निम्न प्रकार से है-
1. पुर्तगाल के उपनिवेश (Colonies of Portugse) : पुर्तगाल ऐसा पहला यूरोपीय देश था जिसने एशिया में अपने उपनिवेश स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। 1498 ई. में पुर्तगाल के यात्री वास्कोडिगामा ने भारत के पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाह कालीकट पहुंचकर भारत पहुंचने के मार्ग की खोज की। उसके बाद 16वीं सदी के प्रारंभ में पुर्तगालियों ने भारत में तथा पूर्वी एशिया में अपने उपनिवेश स्थापित किए, जिनका वर्णन इस प्रकार है-
(i) 1510 ई में पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो अल्बुकर्क ने गोवा पर अधिकार करके पहली पुर्तगाली बस्ती बसायी। इसके बाद उन्होंने दमन, देयू तथा दादरा नगर हवेली पर भी अधिकार स्थापित कर दिया।
(ii) पुर्तगालियों ने दक्षिणी पूर्वी एशिया में स्थित तिमर तथा चीन ने निकट मकाओ द्वीप पर भी 1533 ई. में अपना अधिकार स्थापित किया।
(iii) पुर्तगालियों द्वारा कुछ समय के लिए श्रीलंका पर भी अधिकार स्थापित किया गया परंतु बाद में वह उन्हें डचों के हाथों गंवाना पड़ा।
2. हॉलैंड के उपनिवेश (Dutch Colonies) : 1602 ई. में हॉलैंड के व्यापारियों द्वारा 'डच ईस्ट इंडिया कंपनी' की स्थापना की गई जिसने पुर्तगाली का अनुसरण करते हुए पूर्वी एशियाई देशों के साथ अपना व्यापार आरंभ किया। इसके उपनिवेशों का वर्णन इस प्रकार है- के निकट पुर्तगाली बेड़े को
(i) 'डच ईस्ट इंडिया कंपनी' के जंगी जहाजी बेड़े ने 1602 ई. में बैंटम हराकर बैंटम पर अधिकार कर लिया जो शीघ्र ही पूर्वी एशिया में डचों का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनकर उमरा ।
(ii) डचों ने पुर्तगालियों से 1605 ई. में एंबोबना तथा 1619 ई. में जकार्ता भी छीन लिया तथा वहां बाटेविया को अपनी राजधानी बनाया।
(iii) डचों ने अपने साम्राज्यवादी अभियान के तहत जावा, सुमात्रा, तथा बोर्नियो द्वीपों पर भी कब्जा कर लिया।
(iv) पुर्तगालियों को पराजित करके डचों ने 1614 ई. में मलक्का तथा 1658 ई. में श्रीलंका को भी अपने अधिकार में ले लिया।
(v) डचों ने 1608 ई. में गोलकुंडा के शासक से फरमान प्राप्त करके मछलीपट्टनम में कारखाना लगाया तथा बाद में नागपट्टनम, भडौच, कैम्बे, सूरत तथा चिंसुरा, आगरा व पटना में भी अपने व्यापारिक केंद्र खोलें।
3. फ्रांस के उपनिवेश (French Colonies): भारत तथा पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार करने के लिए 1664 ई. में 'फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी' की स्थापना की गई। इनमें पहले पुर्तगाली, डच तथा अंग्रेज भारत में व्यापारिक सुविधाएं प्राप्त कर चुके थे। अतः उनको भारत में अन्य यूरोपीय कंपनियों विशेषकर इंग्लैंड के साथ कड़ा संघर्ष करना पड़ा। एशिया में फ्रांसीसी साम्राज्यवादी विस्तार का वर्णन इस प्रकार है-
(i) फ्रांसीसी कंपनी ने भारत में 1674 ई. में पांडिचेरी तथा 1690-92 ई. में चंद्रनगर की बस्ती स्थापित की। उसके बाद उन्होंने 1725 ई. में मालाबार तट पर माही तथा 1734 ई. में कोरोमंडल तट पर कारीकल में अपना कारखाना लगाया।
(ii) भारत में अंग्रेजों के साथ हुए तीन कर्नाटक युद्धों (1746-48, 1748-54, 1756-63) में उनकी हार हुई जिसके कारण भारत में उनकी साम्राज्यवादी गतिविधियां लगभग समाप्त हो गई।
(iii) भारत में हार के बाद फ्रांसीसियों ने अपना सारा ध्यान दक्षिण पूर्वी एशिया के अन्य द्वीपों पर लगाया। उन्होंने 1862 ई. में कोचीन (चीन में) तथा 1865 ई. में कंबोडिया पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया
(iv) फ्रांस ने चीन को हराकर 1884-85 ई. में टांकिंग तथा अनाम पर अपना अधिकार कर लिया। 1893 ई. में उसने लाओस पर भी अधिकार कर लिया 1
(v) दक्षिण पूर्व एशिया में फ्रांसीसी बस्तियों को हिन्द-चीन के नाम से जाना जाता था। फ्रांस ने 1725 ई. में हिन्द महासागर में स्थित मॉरिशस पर अधिकार कर लिया था।
4. इंग्लैंड के उपनिवेश (British Colonies) : इंग्लैंड ने अफ्रीका की तरह एशिया में भी विशाल साम्राज्य की स्थापना की जिसका वर्णन निम्न प्रकार से है-
(i) भारत (India) : 1600 ई. में भारत के साथ व्यापार करने लिए 'इंग्लैंड में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया 'कंपनी' की गई। आरंभ में यह कंपनी व्यापार के लिए भारत आई तथा मुगल बादशाहों से व्यापार करने की इजाजत ली थी। धीरे-धीरे इस कंपनी ने अपने व्यापारिक हितों की सुरक्षा के लिए राजनीति के षड्यंत्रों में भाग लेना आरंभ कर दिया। सबसे पहले उन्होंने अपने कट्टर शत्रु फ्रांस को कर्नाटक युद्धों में पराजित करके उन्हें भारत से बेदखल कर दिया। उसके बाद उन्होंने 1757 ई. में प्लासी की लड़ाई के माध्यम से बंगाल में अपने व्यापारिक हितों को सुरक्षा प्रदान की। उसके बाद 1764 ई. में बक्सर के युद्ध में विजय प्राप्त करके बंगाल, बिहार व उड़ीसा पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। उसने धीरे-धीरे 1856 ई. तक लगभग भारत को अपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया था। 1858 ई. में कंपनी से भारत का शासन छीनकर संसद अर्थात् महारानी विक्टोरिया के अधीन ले लिया।
(ii) चीन (China): चीन के अधिकांश भाग पर अंग्रेज अपना अधिकार स्थापित करने में सफल रहे। चीन में अंग्रेजी साम्राज्यवादी गतिविधियों का आरंभ 'अफीम यदों' से होता है। इन युद्धों में चीन को हराकर अंग्रेजों ने नानंकिंग व टाइटसिन की संधियों द्वारा अनेक व्यापारिक रियासतें प्राप्त की। इन युद्धों के परिणामस्वरूप इंग्लैंड को चीन के 16 बंदरगाह तथा हांगकांग का द्वीप भी प्राप्त हुआ। जापान से चीन की हार के बाद इंग्लैंड ने यांग्त्से घाटी पर भी अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। अंग्रेजों ने जिस प्रकार चीन पर अधिकार किया तथा रियायतें प्राप्त कीं। उसका लाभ उठाकर यूरोप को विभिन्न देशों को भी फायदा हुआ तथा उन्होंने चीन को आपस में बांट लिया। इसे इतिहास में 'चीनी खरबूजे का बंटवारा' भी कहा जाता है।
(iii) लार्ड एमहर्स्ट के काल में अंग्रेजों ने वर्मा को पहले युद्ध में (1824-26 ई.) में पराजित करके उसके कुछ हिस्से पर अपना अधिकार कर लिया था। 1885 ई. में लगभग सारा वर्मा अंग्रेजों के हाथों में आ गया तथा 1886 ई. में उसे भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य अंग बना लिया गया।
(iv) नेपोलियन (फ्रांस) की हार के बाद 1915 ई. में वियना सम्मेलन में लिए गए निर्णय के अनुसार हॉलैंड से श्रीलंका को छीनकर इंग्लैंड को दे दिया गया।
(v) गवर्नर जनरल लार्ड लिटन के कार्यकाल में अर्थात् 1878 ई. में अफगानिस्तान भी पूरी तरह से इंग्लैंड के संरक्षण में आ गया था। वहां के शासक ने हमेशा अंग्रेजों के प्रति वफादार रहने का वचन अंग्रेजों को दिया।
(vi) मलाया की आंतरिक अव्यवस्था का लाभ उठाकर अंग्रेजों ने 19वीं सदी के अंत में मलाया को अपने संरक्षण में ले लिया सिंगापुर की वजह से मलाया उनके लिए महत्त्वपूर्ण था ।
(vii) 1904 की ल्हासा संधि के अनुसार तिब्बत ने अंग्रेजों के संरक्षण में आना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार तिब्बत पर व्यावहारिक रूप से अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया।
(viii) फिलिस्तीन, मेसोपोटामिया तथा ट्रांस जार्डन के प्रदेश भी सेवर्स की संधि (1920 में तुर्की के साथ) के तहत तुर्की से छीनकर इंग्लैंड को सौंप दिए गए। इस प्रकार व्यावहारिक रूप से इन देशों पर भी इंग्लैंड का आधिपत्य स्थापित हो गया।
5. जर्मनी के उपनिवेश (German Colonies) : जर्मनी अपने एकीकरण के बाद देर से ही सही पर भूखे शेर की तरह साम्राज्यवादी दौड़ में शामिल हुआ। उसने उपनिवेश स्थापित करने के साथ छीनने की नीति को भी अपनाया जिनका वर्णन इस प्रकार है- स्वीकार कर लिया।
(i) 1885 ई. में इंग्लैंड तथा जर्मनी के बीच संधि के अनुसार न्यूगिनी के क्षेत्र पर जर्मनी का अधिकार
(ii) 1897 ई. में जर्मनी में दो पादरियों की चीन में हुई हत्या का लाभ उठाकर जर्मनी ने चीन से किमायोचाऊ का प्रदेश 99 वर्षों के पट्टे पर प्राप्त कर लिया।
(iii) प्रशांत महासागर में स्थित कैरोलीन तथा मार्शल द्वीपों पर भी जर्मनी ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इस प्रकार कहा जा सकता है कि एशिया को भी यूरोप के देशों ने अफ्रीका की तरह अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपनी साम्राज्यवादी गतिविधियों का शिकार बनाया। अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी इंग्लैंड के पास सबसे ज्यादा उपनिवेश थे। भारत उसके साम्राज्य की 'मणि' कहलाता था क्योंकि भारत का महत्त्व इंग्लैंड के लिए आर्थिक रूप से अन्य उपनिवेशों की अपेक्षा अधिक था।
Q3:- साम्राज्यवाद के मुख्य प्रभावों का वर्णन कीजिए। (Describe main effects of Imperialism.)
20वीं शताब्दी के प्रथम दशक तक एशिया और अफ्रीका के अधिकतर देश प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से यूरोपीय साम्राज्यवाद का शिकार हो चुके थे। इन देशों के आर्थिक संसाधनों का शोषण इनके द्वारा अपने हितों को साधने के लिए किया गया। इस साम्राज्यवादी विचारधारा के कारण दुनिया के सभी भाग एक ही विश्व आर्थिक व्यवस्था के अंतर्गत आ गए थे जो उपनिवेशों के शोषण पर आधारित थी। साम्राज्यवादी प्रभावों से स्वयं साम्राज्यवादी देश भी अपने आपको न बचा सके। उन पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ा। एशिया तथा अफ्रीका पर साम्राज्यवादी विचारधारा के प्रभावों व परिणामों को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
1. आर्थिक शोषण (Economic Exploatitation) साम्राज्यवादी शासन के कारण एशिया और अफ्रीका की आर्थिक समस्याएं बढ़ गई थी। इन महाद्वीपों के विकास में बाधा पड़ी क्योंकि यूरोप के देशों का उद्देश्य अपने-अपने उपनिवेशों से केवल लाभ उठाना ही था। वे बनी हुई वस्तुओं के बदले में इन देशों से कच्चा माल लेते थे, स्थानीय उद्योगों को नष्ट कर देते थे और किसानों से भारी भूमि कर लेते थे। यूरोपीय जमींदारों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त थे, जैसे बिना कर या बहुत कम लगान पर भूमि आयात अधिक और निर्यात कम करने की साम्राज्यवादी देशों की नीति के कारण अधिकृत प्रदेश निर्धन हो गए। वस्तुओं के मूल्य बढ़ गए। इस प्रकार लगभग 100 वर्षों तक यूरोपीय देश एशिया और अफ्रीका का धन लूटते रहे। इस शोषण से ये देश पहले की अपेक्षा अधिक निर्धन हो गए और निर्धनता के कारण वे अन्य देशों की अपेक्षा प्रगति में बहुत पिछड़ गए।
2. विजित क्षेत्रों में निरंकुश शासन (Despotic Rule in Colonies) यूरोप के शक्तिशाली एवं : विकसित देशों ने एशिया और अफ्रीका के कमजोर राज्यों को अपने अधिकार में लेकर वहां पर अपना निरंकुश शासन स्थापित किया। वहां के लोगों से सभी प्रकार के अधिकार छीन लिए गए तथा उन्हें गुलामों जैसा जीवन व्यतीत करने के लिए विवश किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति लिकंन के अनुसार, "जब गोरा आदमी अपने ऊपर भी शासन करता है तो वह स्वशासन है परंतु जब वह दूसरे पर शासन करता है तो वह स्वशासन नहीं निरंकुशता है।"
3. राष्ट्रीय भावनाओं की जागृति (Development of Nationalism) : उपनिवेशों में ज्यों-ज्यों साम्राज्यवादी शोषण बढ़ता गया त्यों-त्यों वहां के लोगों में राष्ट्रीयता की भावना अत्यधिक बलवती होती गई। पश्चिमी शिक्षा, आदर्श, जातिय श्रेष्ठता जैसी बातों ने उनको अपने देश के विषय में कुछ करने के लिए मजबूर कर दिया। इस प्रकार की राष्ट्रीयता भावना 20वीं शताब्दी में काफी जोर पकड़ने लगी तथा पराधीन देशों ने शासन से मुक्त होने के लिए आंदोलनों का सहारा लिया। भारत, बर्मा, मिस्र, सूडान, हिन्देशिया, हिन्दचीन सहित अनेक देश अंततः राष्ट्रीय भावनाओं के बल पर स्वतंत्रता प्राप्त करने से सफल हो गए।
4. ईसाई धर्म प्रचार (Spread of Christinatity) : साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने में ईसाई मिशनरियों के प्रचार का बहुत बड़ा योगदान था। ये मिशनिरियां सबसे पहले एशिया और अफ्रीका के देशों में पहुंची। इन्होंने यूरोपीय व्यापारियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया था इसलिए जब उपनिवेशों में साम्राज्यवादी शासन की स्थापना हुई तो इनको अपने धर्म का प्रचार करने के लिए शासन की तरफ से हर प्रकार का सहयोग दिया गया। इन्होंने स्थानीय लोगों को सरकारी नौकरियों का लालच देकर, पदोन्नति व अन्य नाना प्रकार के प्रलोभन देकर उन्हें ईसाई बनाने का प्रयास किया।
5. उपनिवेशों में गरीबी, भूखमरी एवं बेरोजगारी (Poverty, Starvation and Unemploy- ment in Colonies) साम्राज्यवादी देशों की शोषणकारी नीतियों के कारण उपनिवेशों का व्यापार, वाणिज्य एवं लघु उद्योग तथा कृषि का पतन हो गया जिससे इनमें गरीबी, भुखमरी एवं बेरोजगारी जैसी गंभीर समस्याओं का जन्म हुआ। उपनिवेशों की जनता को भरपेट खाना मिलना बंद हो गया जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। प्राकृतिक आपदाएं भी प्रकृति द्वारा कम अपितु इन देशों (साम्राज्यवादी) की नीतियों द्वारा अधिक आने लगी, जिनसे लाखों लोग मरने लगे।
6. पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रसार (Spread of Western Culture) साम्राज्यवादी शासन के कारण उपनिवेशों के लोगों में पश्चिमी वस्तुओं का आकर्षण बढ़ा। मनोरंजन, संगीत, नृत्य, वेश-भू -भूषा एवं खान-पान पर भी पश्चिमी सभ्यता का असर दिखाई देने लगा। पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव से अविकसित देशों के समाज में व्याप्त अनेक बुराइयों जैसे- सती प्रथा, कन्या वध, नर मांस भक्षण, मानव बलि, अंधविश्वासों आदि का उन्मूलन हुआ। लोगों में आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के प्रति उत्साह पैदा हुआ तथा उन्होंने पश्चिम के वैज्ञानिक ज्ञान का भी लाभ उठाया।
7. उपनिवेशों का विकास (Development of Colonies) : साम्राज्यवादी देशों के औपनिवेशिक शोषण के बावजूद भी उपनिवेशों का कुछ विकास तो अवश्य हुआ। औपनिवेशिक शासन ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उपनिवेशों में यातायात के साधनों का विकास किया। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में सुधार किए। सरकार विरोधी गतिविधियों की जानकारी तथा दमन के लिए संचार साधनों का विकास किया। स्थानीय लोगों में असंतोष कम करने के लिए प्रशासनिक सुधार किए। अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए उद्योग स्थापित किए। पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति के प्रसार के लिए शिक्षा व्यवस्था का प्रबंध किया परंतु यह सब इन शक्तियों ने अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए किया।
8. प्रजातांत्रिक व्यवस्था का प्रसार (Spread of Democratic Ideas) : अपने उपनिवेशों में स्थानीय लोगों के असंतोष को देखते हुए औपनिवेशिक सरकारों द्वारा कुछ प्रशासनिक सुधार भी किए गए। इन सुधारों के अंतर्गत ही लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्णय हुआ। इससे अधिकांश उपनिवेशों में प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का ढांचा तैयार हो गया। धीरे-धीरे इन देशों में प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाएं मजबूत हो गई तथा स्थानीय लोगों को प्रशानिक अनुभव भी हुआ। इस प्रकार एशिया और अफ्रीका में लोकतंत्र को फलने-फूलने का अवसर मिला।
9. स्वतंत्रता आंदोलनों को कुचलना (Supersion of Freedom Movements) : विदेशी शासन के विरुद्ध उपनिवेशों में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जो आंदोलन चले, उन्हें औपनिवेशिक सरकारों ने तानाशाही व अत्याचारी तरीके से कुचल दिया। भारत में 'जलियांवाला बाग हत्याकांड' भूलाया नहीं जा सकता जहां पर हजारों निहत्थे लोगों को गोलियों से भून दिया गया था। अन्य देशों में भी इस प्रकार के अनगिनत उदाहरण है जो औपनिवेशिक शासन की अत्याचारी नीतियों को उजागर करते हैं। इस प्रकार उपनिवेशों के स्वतंत्र आंदोलनों को साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा बुरी तरह से कुचला दिया गया।
10. साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा (Impelialistic Rivalry) यूरोप के देशों के बीच एशिया और अफ्रीका के अधिक से अधिक प्रदेशों को अपने अधिकार में लेने की होड़ लगी थी क्योंकि इन देशों से प्राप्त होने वाली धन-संपदा ने साम्राज्यवादियों को लालची बना दिया था। यूरोप में उपनिवेशों को लेकर लगातार युद्ध होने लगे। एक-दूसरे को पराजित करने के लिए गुटबंदियां की जाने लगी। इस प्रकार की गुटबंदियों के कारण साम्राज्यवादी देश दो भागों में विभाजित हो गए। उनकी यही गुटबंदी प्रथम विश्व युद्ध का कारण बनी जिसमें लाखों लोगों की जानें गई तथा आर्थिक नुकसान का तो अनुमान लगाना भी कठिन है। अंतत यह कहा जा सकता है कि यह विचारधारा उपनिवेशों के लिए किसी अभिशाप से कम न थी । इस विचारधारा के अतंर्गत स्थापित उपनिवेशों में जनता का जीवन नरकीय हो गया था। भूख से लोग मारे जाने लगे थे। इस विचारधारा के अंतर्गत उपनिवेशों का कुछ विकास भी हुआ परंतु यह विकास जनकल्याणकारी भावनाओं को ध्यान में रखकर नहीं किया गया था अपितु अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए किया गया था। साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा विश्व को प्रथम विश्व युद्ध की तरफ ले गई जिससे मानवता को गंभीर कष्ट उठाने पड़े।
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